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छोटे पैमाने पर मछली पकड़ने से रे पर संकट, बढ़ती पकड़ में छिपी आबादी की गिरावट

तमिलनाडु के अध्ययन में कुल पकड़ बढ़ने के बावजूद प्रति नाव रे मछलियों की पकड़ घटी। मोंगाबे इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, बेहतर तकनीक और ज्यादा नावें आबादी में गिरावट को छिपा सकती हैं।

एग्रीवाणी डेस्क · 4 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: मछली पकड़ने वाली नाव
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: Michał Robak / Pexels

मोंगाबे इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, छोटे पैमाने पर समुद्र में मछली पकड़ने की गतिविधियां भी मांटा और डेविल रे की आबादी पर भारी पड़ रही हैं। तमिलनाडु में 2013 और 2023 के बीच हुए बदलावों की जांच में शोधकर्ताओं को इन मछलियों की आबादी घटने के संकेत मिले। चिंता यह है कि कुल पकड़ बढ़ने के बावजूद प्रति नाव पकड़ कम हुई।

मछली पकड़कर आजीविका चलाने वालों के लिए रिपोर्ट की अहम सीख है कि ज्यादा मछली बाजार में आना, समुद्र में उनकी संख्या बढ़ने का प्रमाण नहीं है। रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने बताया है कि अधिक नावों और बेहतर तकनीक से पकड़ बढ़ सकती है, जबकि मछलियों की आबादी घट रही हो।

कुल पकड़ बढ़ी, लेकिन प्रति नाव कम मिली मछली

रिपोर्ट के अनुसार, शोधकर्ताओं ने तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले में थ्रेसपुरम और थरुवैकुलम के मछली उतारने वाले स्थलों के आंकड़े जांचे। मांटा और डेविल रे को साथ में मोबुलिड कहा जाता है। दर्ज अनचाही मोबुलिड पकड़ में स्पाइनटेल डेविल रे की हिस्सेदारी 86 प्रतिशत तक थी।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अध्ययन अवधि में थ्रेसपुरम में प्रति नाव स्पाइनटेल डेविल रे की पकड़ 86 प्रतिशत, सिकलफिन डेविल रे की 92 प्रतिशत और मांटा रे की 83 प्रतिशत घटी। थरुवैकुलम में बेंटफिन डेविल रे की पकड़ में 65 प्रतिशत कमी मिली। इसके विपरीत, इसी अवधि में रे की कुल पकड़ 4 प्रतिशत बढ़ी।

रिपोर्ट में अध्ययन की सहलेखक दिव्या कर्नाड ने समझाया है कि आबादी का वास्तविक बदलाव जानने के लिए पकड़ी गई मछलियां गिनना ही पर्याप्त नहीं है। नावों की संख्या और उनके उपकरणों की क्षमता को भी साथ देखना पड़ता है। शोधकर्ताओं ने बढ़ते पकड़ दबाव के साथ आबादी में गिरावट को जरूरत से ज्यादा मछली पकड़े जाने का संभावित नतीजा माना है।

वयस्क रे घटने से आबादी संभलना मुश्किल

रिपोर्ट के मुताबिक, पकड़ी गई स्पाइनटेल डेविल रे में वयस्कों की हिस्सेदारी 64 प्रतिशत से घटकर 26 प्रतिशत रह गई। उनके फैले हुए पंखों के सिरों के बीच की औसत चौड़ाई भी 10 सेंटीमीटर कम मिली। शोधकर्ताओं के अनुसार, इसका अर्थ जरूरी नहीं कि वयस्क मछलियां छोटी होने लगी हैं। इसकी वजह आबादी में वयस्कों की संख्या घटना भी हो सकती है।

रिपोर्ट बताती है कि ये रे हर दो से तीन साल में केवल एक बच्चा देती हैं। ऐसे में वयस्कों की कमी की भरपाई मुश्किल होती है। अध्ययन की प्रमुख लेखिका मयूरी चोपड़ा के अनुसार, वयस्क कम बचने से आबादी के फिर संभलने की गुंजाइश सीमित होती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि उम्रदराज रे के बड़े गिल प्लेट, यानी गलफड़ों की पट्टियां, आर्थिक रूप से ज्यादा मूल्यवान होते हैं। इससे उनके अधिक पकड़े जाने का जोखिम रहता है।

टूना पकड़ने वाले जालों में भी फंसती हैं रे

रिपोर्ट के अनुसार, उथले तटीय पानी में भोजन तलाशने वाली रे जाल में उलझ सकती हैं। अध्ययन में दर्ज मोबुलिड पकड़ का 98.9 प्रतिशत बहते गिल जालों से आया। अकेले टूना पकड़ने वाली गतिविधियों की हिस्सेदारी कुल अनचाही मोबुलिड पकड़ में 50.2 प्रतिशत थी। इससे स्पष्ट होता है कि रे को निशाना बनाए बिना भी मछली पकड़ने का काम उसकी आबादी पर दबाव डाल सकता है।

रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर मत्स्य गतिविधियों के कारण हर साल लगभग 259,000 मोबुलिड मारे जाने का आंकड़ा दिया गया है। इसमें भारत की हिस्सेदारी 28.2 प्रतिशत बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पकड़ और उसके लिए लगाए गए प्रयास के पर्याप्त आंकड़े न होने से आबादी की गिरावट नजर से छूट सकती है।

व्यापार पर रोक के बाद घरेलू संरक्षण अहम

रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल 2023 से भारत में मांटा रे को वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत सर्वोच्च सुरक्षा मिली हुई है, जिसमें शिकार और व्यापार प्रतिबंधित हैं। डेविल रे की प्रजातियों को अपेक्षाकृत कमजोर संरक्षण मिला है, जबकि उनकी प्रजनन दर भी धीमी है और वे भी पकड़ के दबाव का सामना करती हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि नवंबर 2025 में मांटा और डेविल रे की सभी 10 प्रजातियों को साइट्स की सर्वोच्च प्रतिबंध वाली सूची में शामिल किया गया। इससे इनके और इनसे बने उत्पादों के वाणिज्यिक अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर रोक लगी। हालांकि, यह रोक देश के भीतर होने वाली पकड़ और बिक्री को नियंत्रित नहीं करती।

रिपोर्ट के अनुसार, जाल में अनचाहे फंसी रे को छोड़ने के लिए मछुआरों को मुआवजा नहीं मिलता और ऐसी मछलियां स्थानीय बाजार में खाने के लिए बिकती हैं। शोधकर्ताओं ने आशंका जताई है कि निर्यात बाजार बंद होने पर बिक्री स्थानीय खपत की ओर मुड़ सकती है। यह व्यापार के आंकड़ों में दिखे बिना भी पकड़ का दबाव बनाए रख सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, आगे संरक्षण का असर घरेलू मत्स्य नीतियों और स्थानीय स्तर पर नियमों के पालन पर निर्भर करेगा।

मछली पकड़ने वालों के लिए काम की बातें

  • अध्ययन की सीख ध्यान में रखें। केवल कुल पकड़ बढ़ने से समुद्र में मछलियां बढ़ने का अनुमान न लगाएं, नावों और उपकरणों में बदलाव भी देखें।
  • टूना पकड़ने के दौरान रे के अनचाहे जाल में फंसने को भी गंभीर मानें। रिपोर्ट में यह रे पर दबाव की अहम वजह सामने आई है।
  • वयस्क रे कम मिलने को नजरअंदाज न करें। रिपोर्ट में इसे आबादी के दोबारा संभलने की क्षमता से जोड़ा गया है।
  • मांटा और डेविल रे के संरक्षण नियम एक जैसे न मानें। नियमों के पालन से जुड़ी सलाह के लिए स्थानीय कृषि विभाग से संपर्क करें।

स्रोत

यह खबर किसी किसान साथी के काम आ सकती है

लेखक

एग्रीवाणी डेस्क

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