खेती से जुड़े जैविक संसाधनों के इस्तेमाल से प्राप्त धन अब उनके संरक्षण और स्थानीय समुदायों के कल्याण में लगाया जाएगा। पीआईबी की 17 अक्टूबर 2026 की विज्ञप्ति के अनुसार, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने लाभ साझाकरण के तहत 1.19 करोड़ रुपये बांटे हैं। यह धन 29 राज्यों की जैव विविधता परिषदों तथा एक केंद्र शासित प्रदेश की परिषद को मिला है।
उत्तर प्रदेश के हिस्से में 8,26,607.00 रुपये आए हैं। किसानों के लिए इस खबर का महत्व खेती की विविधता और सामुदायिक आजीविका से इसके जुड़ाव में है। यह आवंटन परिषदों को हुआ है, इसे किसानों के खातों में सीधे भुगतान की घोषणा नहीं समझें।
कंपनियों के अंशदान से कहां पहुंचा धन
यह राशि पहुंच और लाभ साझाकरण व्यवस्था, यानी एबीएस, के तहत जुटाई गई। कंपनियों ने कृषि जैविक संसाधनों पर शोध और उनके कारोबारी इस्तेमाल के बदले अंशदान दिया था। इस तरह खेती के संसाधनों के उपयोग से मिलने वाले लाभ को संरक्षण और समुदायों की भलाई से जोड़ा गया है।
आवंटन में महाराष्ट्र को 19,46,149.00 रुपये, राजस्थान को 13,97,525.00 रुपये और मध्य प्रदेश को 13,32,250.00 रुपये मिले हैं। उत्तर प्रदेश भी सबसे अधिक राशि पाने वाले दस राज्यों में शामिल है। बिहार का हिस्सा 4,82,143.00 रुपये है।
कृषि क्षेत्र के आंकड़ों से तय हुआ हिस्सा
जैविक संसाधन बाजार या व्यापारियों से लिए गए थे। इससे यह पहचानना आसान नहीं था कि व्यक्तिगत लाभार्थी कौन हैं। इस स्थिति में विशेषज्ञ समिति की सुझाई वितरण व्यवस्था अपनाई गई, जिसे प्राधिकरण ने मंजूरी दी थी।
संबंधित जैविक संसाधनों के अनुमानित खेती क्षेत्र का अनुपात आवंटन का आधार बना। इसके लिए कृषि मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल पर प्रकाशित सरकारी आंकड़े इस्तेमाल किए गए। यानी परिषदों का हिस्सा तय करने में संबंधित संसाधन की खेती का क्षेत्र देखा गया।
मक्का, चावल, बाजरा और कपास से जुड़ा अंशदान
इस आवंटन का संबंध मक्का, चावल, बाजरा और कपास के जैविक संसाधनों से है। मक्का तथा मीठे मक्के की किस्मों के इस्तेमाल के लिए कोर्टेवा, पायनियर, लिमाग्रेन और सिंजेंटा सहित कंपनियों से अंशदान प्राप्त हुआ।
लिमाग्रेन इंडिया ने मक्का के पांच संकरों, चावल के दो संकरों तथा बाजरा के तीन संकरों के लिए भी योगदान दिया। कपास में कोर्टेवा क्रॉप इंडिया का अंशदान 16 किस्मों पर शोध से जुड़ा था। क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन ने कपास के 14 संकरों के व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए योगदान किया।
पीआईबी के मुताबिक, ऐसे योगदान पारंपरिक किस्मों और आनुवंशिक विविधता को बचाने में सहायक हो सकते हैं। किसानों के लिहाज से इसका महत्व केवल फसल के कारोबारी उपयोग तक सीमित नहीं है। उससे प्राप्त लाभ खेती की जैव विविधता बनाए रखने में भी काम आ सकता है।
आगे संरक्षण और आजीविका पर होगा उपयोग
परिषदों को मिली राशि जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 32(2) में तय गतिविधियों पर ही खर्च होगी। इनमें जैव विविधता का ब्यौरा तैयार करना, संरक्षण करना और संसाधनों का टिकाऊ इस्तेमाल शामिल है। शोध, क्षमता निर्माण, स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन को मजबूत करना तथा समुदायों की आजीविका सुधारना भी इसके उपयोग के क्षेत्र हैं।
एनबीए कृषि क्षेत्र से प्राप्त 86 करोड़ रुपये अब तक विभिन्न लाभार्थियों तक पहुंचा चुका है। सभी क्षेत्रों को मिलाकर उसका वितरण 203 करोड़ रुपये से अधिक रहा है। ये अलग दायरे के आंकड़े हैं, कृषि से मिला अंशदान व्यापक संरक्षण प्रयासों का हिस्सा है।
किसान इन बातों पर ध्यान दें
- परिषदों को मिले आवंटन और व्यक्तिगत किसान को मिलने वाले भुगतान में फर्क रखें। इस खबर में राशि परिषदों को दी गई है।
- मक्का, चावल, बाजरा और कपास के संदर्भ में समझें कि शोध तथा व्यावसायिक इस्तेमाल से मिला अंशदान संरक्षण से जोड़ा गया है।
- आगे धन के उपयोग को दस्तावेजीकरण, संरक्षण, शोध और सामुदायिक आजीविका जैसी निर्धारित गतिविधियों के संदर्भ में देखें।
- पारंपरिक किस्मों और खेती की जैव विविधता के संरक्षण पर स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।
स्रोत
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने पहुंच और लाभ साझाकरण व्यवस्था के अंतर्गत 29 राज्य जैव विविधता परिषदों और एक केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषद को 1.19 करोड़ रुपये वितरित किए, पत्र सूचना कार्यालय (PIB), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, 17 अक्टूबर 2026





