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कम दबाव के तंत्र बदल रहे बारिश का बंटवारा, सिंचाई के लिए स्थानीय हालात अहम

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, मानसून की बारिश में कम दबाव के तंत्रों का रास्ता और सक्रियता अहम रहे। देश की कुल बारिश का आंकड़ा अलग-अलग इलाकों में पानी की कमी या अधिकता नहीं समझाता।

एग्रीवाणी डेस्क · 4 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: खेत की सिंचाई
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: Collab Media / Pexels

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के मानसून में कम दबाव के तंत्रों की सक्रियता और उनके गुजरने के रास्तों ने बारिश के क्षेत्रीय बंटवारे को काफी प्रभावित किया। जिन इलाकों से ये तंत्र गुजरे, वहां बारिश केंद्रित रही, जबकि दूसरे इलाकों में कमी बनी रही। किसानों के लिए इसका मतलब है कि देश की कुल बारिश का आंकड़ा उनके इलाके में सिंचाई के पानी की स्थिति समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।

रिपोर्ट में जून से सितंबर तक की बारिश का विश्लेषण किया गया है। इसमें कहीं सामान्य से कम बारिश, तो कहीं बहुत भारी बारिश की घटनाएं सामने आई हैं। पानी और सिंचाई की योजना के लिहाज से यह फर्क अहम है, क्योंकि पूरे मानसून का औसत किसी खास महीने और इलाके की स्थिति को नहीं बताता।

जून की कमी के बाद जुलाई में बदला बारिश का रुख

रिपोर्ट के मुताबिक, जून में कम दबाव का कोई तंत्र सक्रिय नहीं था। इस महीने देश की बारिश सामान्य से 35 प्रतिशत कम रही और मध्य भारत में कमी 50 प्रतिशत थी। जुलाई में इन तंत्रों की सक्रियता के साथ बारिश की स्थिति बदली। पहला तंत्र 2 जुलाई को बना और बाद में अवदाब में बदल गया। इसके असर वाली बारिश हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड तक पहुंची, जहां अत्यधिक बारिश, अचानक बाढ़ और भूस्खलन हुए।

रिपोर्ट में बताया गया है कि जुलाई के 31 दिनों में 24 दिन कम दबाव के तंत्र सक्रिय रहे। यह जुलाई के दीर्घकालीन औसत से 10 दिन ज्यादा था। मध्य भारत में जुलाई की बारिश सामान्य से 33 प्रतिशत ज्यादा हो गई, जबकि देश की बारिश सामान्य से 1 प्रतिशत ऊपर रही। यानी जून में बारिश की कमी झेलने वाले क्षेत्र का अनुभव अगले महीने अलग था।

तंत्र का रास्ता अहम, पड़ोसी राज्यों में भी फर्क

रिपोर्ट के मुताबिक, 31 जुलाई तक बिहार में बारिश सामान्य से 42 प्रतिशत और झारखंड में 29 प्रतिशत कम थी। दूसरी ओर, कम दबाव के तंत्रों के रास्ते में आए ओडिशा में सामान्य से 34 प्रतिशत ज्यादा बारिश दर्ज हुई। यह तुलना बताती है कि आसपास के राज्यों में भी मानसून का असर एक जैसा नहीं रहा।

रिपोर्ट में अगस्त के दौरान भी बारिश के इसी तरह केंद्रित रहने का जिक्र है। कम दबाव के तंत्र ओडिशा से उत्तर-पश्चिम भारत की तरफ बढ़े और उनके रास्ते में, खासकर सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्र में, बारिश केंद्रित हुई। अगस्त में ऐसे तंत्रों की सक्रियता 26 दिन रही, जबकि सामान्य अवधि 17 दिन है। इसके बावजूद देश की बारिश सामान्य से 16.3 प्रतिशत कम रही। इसलिए ज्यादा सक्रिय दिनों को हर इलाके में पर्याप्त बारिश का संकेत नहीं माना जा सकता।

सितंबर में उत्तर प्रदेश तक भारी बारिश का असर

रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर में देश की बारिश सामान्य से 8 प्रतिशत कम रही। इसके उलट उत्तर-पश्चिम भारत में सामान्य से 17 प्रतिशत और मध्य भारत में 3 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई। उत्तर-पश्चिम में कम दबाव के तंत्रों और वहां पहले से मौजूद बेमौसम पश्चिमी विक्षोभों की परस्पर सक्रियता ने इस अंतर में अहम भूमिका निभाई।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 22 सितंबर को बंगाल की खाड़ी के ऊपर एक तंत्र मजबूत होकर गहरे अवदाब में बदला। यह आंध्र प्रदेश से मध्य और उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ा। इसके प्रभाव से उत्तर प्रदेश में असाधारण रूप से भारी बारिश हुई और बारिश से जुड़ी घटनाओं में 56 लोगों की जान गई। यह घटना बताती है कि मानसून को केवल बारिश की कमी के नजरिए से नहीं देखा जा सकता, अत्यधिक बारिश का जोखिम भी अहम है।

आगे की योजना के लिए क्या संकेत हैं

डाउन टू अर्थ के विश्लेषण में हाल के वर्षों के दौरान मानसून में कम दबाव के तंत्रों के सक्रिय दिन दीर्घकालीन सामान्य स्तर से ज्यादा रहने के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट इसे इन तंत्रों की सक्रियता अधिक समय तक बने रहने से जोड़ती है। यह विश्लेषण किसी आगामी महीने की स्थानीय बारिश का पूर्वानुमान नहीं है। किसानों के लिए इसकी अहम सीख बारिश के कुल आंकड़े के साथ उसके समय और क्षेत्रीय बंटवारे को समझना है।

किसान पानी और सिंचाई की योजना में क्या ध्यान रखें

  • देश की कुल बारिश को अपने इलाके की स्थिति न मानें। स्थानीय बारिश और खेत की पानी की जरूरत के आधार पर सिंचाई की सलाह लें।
  • बारिश का महीनेवार फर्क देखें। रिपोर्ट में जून और जुलाई के बीच मध्य भारत की स्थिति में बड़ा बदलाव सामने आया है।
  • कम दबाव के तंत्र की सक्रियता के साथ उसका रास्ता भी देखें। रिपोर्ट में बारिश उन्हीं रास्तों पर केंद्रित रहने का उल्लेख है।
  • बारिश की कमी या अत्यधिक बारिश की स्थिति में खेत के पानी और सिंचाई संबंधी फैसलों के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।

स्रोत

यह खबर किसी किसान साथी के काम आ सकती है

लेखक

एग्रीवाणी डेस्क

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