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तेलंगाना में पेयजल बचाने के लिए धान की एक फसल छोड़ने की अपील

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने किसानों से धान की एक मौसमी फसल छोड़ने की अपील की है। मकसद सीमित पानी को अगले मानसून तक पेयजल के लिए बचाना है।

एग्रीवाणी डेस्क · 3 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: धान का खेत
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: hartono subagio / Pexels

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने 15 अक्टूबर को किसानों से धान की एक मौसमी फसल नहीं लेने की अपील की। उन्होंने पीने के पानी की आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए किसानों का सहयोग मांगा। किसानों के लिए इस अपील का मतलब है कि धान की खेती का फैसला सिंचाई के साथ पेयजल की जरूरत को ध्यान में रखकर करने को कहा गया है।

रिपोर्ट में इस अपील को सुपर अल नीनो से जुड़े सूखे और पानी की कमी की पृष्ठभूमि में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार, रेड्डी ने पानी और बिजली की व्यवस्था पर भारी दबाव की बात कही। उनकी बताई रणनीति सीमित उपलब्ध पानी को अगले मानसून तक चलाने और पेयजल को प्राथमिकता देने की है।

बारिश की कमी से जलाशयों पर दबाव

रिपोर्ट में दिए गए सरकारी आकलन के अनुसार, अक्टूबर के मध्य तक राज्य में बारिश की कमी करीब 28 प्रतिशत थी। जलाशयों में पानी उनकी क्षमता के आधे से भी कम बताया गया है। रिपोर्ट का कहना है कि सूखे दौर ने राज्य की जल सुरक्षा को खतरे में डाला है। ऐसे में चिंता केवल खेतों तक पानी पहुंचाने की नहीं, घरों के लिए पीने का पानी बचाए रखने की भी है।

डाउन टू अर्थ के अनुसार, कृषि राज्य में पानी का सबसे बड़ा उपयोग करने वाला क्षेत्र है। इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री ने किसानों से धान की एक फसल छोड़ने का आग्रह किया है। रिपोर्ट में बताई गई प्राथमिकता उपलब्ध पानी का इस्तेमाल पहले पेयजल की जरूरत पूरी करने के लिए करना है।

खड़ी धान की फसल भी चिंता में

रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना में अनुमानित 1.3 मिलियन हेक्टेयर खेतों में किसानों ने धान की खेती नहीं की है। वहीं 5.3 मिलियन हेक्टेयर में धान बोया जा चुका है। पानी की कमी से खेतों में खड़ी फसल प्रभावित होने की आशंका रिपोर्ट में जताई गई है।

किसानों के सामने इसलिए अलग तरह की चिंताएं हैं। मुख्यमंत्री की अपील एक मौसमी फसल छोड़ने को लेकर है, जबकि जिन खेतों में धान लगा हुआ है, वहां उपलब्ध पानी से फसल संभालने का सवाल है। रिपोर्ट में खड़ी फसल पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है, नुकसान हो जाने का दावा नहीं किया गया है।

अल नीनो के आगे बढ़ने पर नजर

डाउन टू अर्थ ने विश्व मौसम विज्ञान संगठन के पूर्वानुमान के हवाले से बताया है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में जारी अल नीनो, 1950 में अवलोकन शुरू होने के बाद सबसे मजबूत घटना बन सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इसके दिसंबर में चरम पर पहुंचने का अनुमान है। इसे आगे की स्थिति का पूर्वानुमान समझना जरूरी है, निश्चित परिणाम नहीं।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में संवेदनशील जिलों की पहचान और फसलों को बचाने के लिए सूखे से निपटने की गतिविधियां शुरू की गई हैं। कई राज्यों में सूखा घोषित होने से किसानों की सहायता के लिए राहत कार्यों का रास्ता खुला है। हालांकि, रिपोर्ट का जोर इस बात पर है कि पिछले अल नीनो के असर को मौजूदा घटना का सीधा नमूना नहीं माना जा सकता। इसके आगे बढ़ने के साथ प्रभावों की तस्वीर अधिक साफ होगी।

किसान किन बातों का ध्यान रखें

  • धान की अगली मौसमी फसल का निर्णय लेने से पहले स्थानीय कृषि विभाग से उपलब्ध सिंचाई पानी और फसल की योजना पर सलाह लें।
  • खेत में धान खड़ा है तो पानी की कमी की स्थिति में उसकी देखभाल के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से मार्गदर्शन लें।
  • मुख्यमंत्री की अपील को एक मौसमी धान फसल छोड़ने के संदर्भ में समझें। रिपोर्ट में इसे पेयजल बचाने की जरूरत से जोड़ा गया है।
  • अल नीनो के पूर्वानुमान को अपने खेत में तय नुकसान न मानें। स्थानीय स्थिति के आधार पर कृषि विभाग की सलाह लेकर खेती का फैसला करें।

स्रोत

यह खबर किसी किसान साथी के काम आ सकती है

लेखक

एग्रीवाणी डेस्क

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