सीधे खबरों पर जाएं
AgriVaani एग्रीवाणी: खेती का यथार्थ और हिसाबEN English
ताजा

बंगाल की दुर्गा पूजा में मिट्टी और जलवायु की चिंता, पंडालों से संरक्षण का संदेश

पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा पंडालों में मिट्टी और पर्यावरण संरक्षण को जगह मिल रही है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में खाद्य सुरक्षा, मिट्टी के प्रदूषण और तालाब बचाने जैसे खेती से जुड़े मुद्दे सामने आए हैं।

एग्रीवाणी डेस्क · 4 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: खेत की मिट्टी
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: Guerrero De la Luz / Pexels

खेती की बुनियाद मिट्टी और पानी से जुड़े सवाल पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा पंडालों में भी उठ रहे हैं। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस वर्ष पर्यावरण से जुड़ी प्रस्तुतियों में मिट्टी को खास जगह मिली है। कहीं मिट्टी के बर्तनों के जरिए स्थानीय आजीविका दिखाई गई है, तो कहीं प्राकृतिक सामग्री से तालाब संरक्षण का संदेश दिया गया है।

रिपोर्ट में मिट्टी से जुड़ी प्रस्तुतियों की बढ़ती मौजूदगी को शहरों में खाद्य सुरक्षा और मिट्टी के प्रदूषण की चिंता से संभावित रूप से जोड़ा गया है। इसमें कीटनाशकों से होने वाला प्रदूषण भी शामिल है। किसान के नजरिए से इसकी अहमियत यह है कि खेती से जुड़े ये सवाल पूजा आयोजनों के जरिए आम लोगों के सामने रखे जा रहे हैं।

पर्यावरण की बात करने वाले पंडाल बढ़े

रिपोर्ट में हरित पूजा पुरस्कार से जुड़े दुलाल बोस ने बताया कि यह पहल 19 वर्षों से चल रही है। उनके अनुसार, इससे आयोजकों और दर्शकों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में मदद मिली है। पुरस्कार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पंडालों की विषयवस्तु में पर्यावरण के मुद्दों की जगह लगातार बढ़ी है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के अनिरुद्ध मुखर्जी ने रिपोर्ट में इस बदलाव का शुरुआती उदाहरण दिया। उनके अनुसार, 2007 में पुरस्कार शुरू होने पर साल्ट लेक की केवल एफडी ब्लॉक पूजा को हरित विषय अपनाने के लिए तैयार किया जा सका था। उस आयोजन में वैश्विक तापवृद्धि का मुद्दा उठाया गया था। अब प्रस्तुतियों में मिट्टी और पानी बचाने, जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण और सुंदरबन जैसे विषय शामिल हैं।

रिपोर्ट में सुजाता बसु के हवाले से बताया गया है कि इस वर्ष 200 से अधिक आवेदन मिले। इनमें पर्यावरण से जुड़े विषय या तौर-तरीके अपनाने वाले करीब 75 पूजा आयोजनों को मूल्यांकन के लिए चुना गया है। यह चयन केवल पंडाल की सजावट का नहीं, आयोजन में अपनाए जा रहे व्यवहार का भी है।

मिट्टी, तालाब और स्थानीय आजीविका का रिश्ता

रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर कोलकाता के अहिरीटोला सार्वजनिन ने इलाके के पारंपरिक मिठाई कारोबार को मिट्टी के बर्तनों से जोड़ा। मिठाइयां रखने में इस्तेमाल होने वाले इन बर्तनों को स्थानीय स्तर पर भर कहा जाता है। इस प्रस्तुति में मिट्टी को स्थानीय कामकाज और रोजी-रोटी के संदर्भ में दिखाया गया।

दमदम के पास युवा संघ ने मिट्टी और दूसरी प्राकृतिक सामग्री के इस्तेमाल से तालाब संरक्षण पर प्रस्तुति तैयार की। रिपोर्ट में बताया गया है कि कोलकाता के दक्षिणी किनारे पर हरिदेवपुर के पंडालों में नाव बांधने की जगहों और सुंदरबन से प्रेरित सज्जा के लिए भी मिट्टी इस्तेमाल हुई। खेती के संदर्भ में इन प्रस्तुतियों का साझा मुद्दा मिट्टी और जल संसाधनों का संरक्षण है, हालांकि ये खेती की तकनीकी सलाह के बजाय जनजागरूकता के उदाहरण हैं।

संदेश के साथ आयोजन के तौर-तरीकों की जांच

रिपोर्ट के अनुसार, हरित पूजा पुरस्कार के मूल्यांकन में निर्माण की सामग्री, कचरा प्रबंधन, प्लास्टिक का इस्तेमाल, बिजली की खपत, शोर और आयोजन के बाद ढांचा हटाने के तरीके देखे जाते हैं। यानी पर्यावरण का संदेश देने के साथ यह भी परखा जाता है कि आयोजक खुद कौन से कदम अपना रहे हैं।

रिपोर्ट में जनस्वास्थ्य विशेषज्ञ कृष्णज्योति गोस्वामी ने बताया कि मूर्तियों में सीसा युक्त रंगों का इस्तेमाल घटाना इस पहल की अहम उपलब्धि है। उनके अनुसार, करीब 60 प्रतिशत मूर्तियों पर अब सीसा रहित रंग इस्तेमाल होते हैं। मूल्यांकन में ऐसी मूर्तियों के लिए अलग अंक रखे गए हैं। आयोजकों ने कम बिजली खर्च करने वाली एलईडी और सीएफएल रोशनी का इस्तेमाल बढ़ने की भी जानकारी दी है।

आगे विस्तार की बात, समुदाय की भागीदारी पर जोर

रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 के पुरस्कारों की शुरुआत के अवसर पर मनोज कुमार ओरांव ने पर्यावरण के अनुकूल पूजा आयोजनों को प्रोत्साहन देने के लिए इस मॉडल का विस्तार करने की बात कही। इसे विस्तार के सुझाव के रूप में रखा गया है।

रिपोर्ट में निर्णायकों और विशेषज्ञों ने समुदाय तथा महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का भी उल्लेख किया है। पर्यावरण उद्यमी झुम्पा घोष के अनुसार, कई पूजा समितियों में महिलाएं नेतृत्व की भूमिका ज्यादा निभा रही हैं। इससे संरक्षण का संदेश केवल प्रदर्शनी तक सीमित न रहकर आयोजन की जिम्मेदारियों से भी जुड़ता दिखाई देता है।

किसान के लिए काम की बातें

  • मिट्टी के प्रदूषण और खाद्य सुरक्षा को साथ रखकर देखें। रिपोर्ट में इन्हीं चिंताओं को मिट्टी से जुड़े विषयों की प्रमुखता का संभावित कारण बताया गया है।
  • तालाब संरक्षण वाली प्रस्तुतियों को पानी बचाने पर सामुदायिक चर्चा का उदाहरण मानें। खेत पर उपयुक्त उपाय के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।
  • सामुदायिक आयोजन में सजावट के साथ सामग्री, प्लास्टिक, कचरे और बिजली के इस्तेमाल पर भी ध्यान दें। रिपोर्ट में पुरस्कार का मूल्यांकन इन्हीं पहलुओं से जुड़ा बताया गया है।
  • कीटनाशकों या मिट्टी के उपचार का फैसला पंडाल के संदेश के आधार पर न करें। अपने खेत की जरूरत के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।

स्रोत

इससे जुड़ी खबरें