डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, दूध गंगा में घटता बहाव श्रीनगर के ऊपरी शहरी इलाकों की जलापूर्ति को प्रभावित कर रहा है। रिपोर्ट में कम बर्फबारी, बढ़ते तापमान और बारिश के बदलते ढंग को पानी की उपलब्धता पर दबाव की वजह बताया गया है। परेशानी केवल सूखे दौर की नहीं है, भारी बारिश के साथ आने वाला मटमैला पानी भी आपूर्ति रोक सकता है।
किसानों के लिए इस खबर का अहम पहलू पानी मिलने के मौसमी चक्र में बदलाव है। रिपोर्ट में वैज्ञानिक ने बताया है कि गर्मियों तक धीरे-धीरे पिघलने वाली बर्फ अब पहले पिघल रही है। हालांकि, रिपोर्ट में खेतों की सिंचाई या फसल नुकसान का आकलन नहीं है। इसलिए इसे खेती में हुए नुकसान के आंकड़े के बजाय पानी की उपलब्धता से जुड़ी चेतावनी के रूप में समझना जरूरी है।
बर्फ जल्दी पिघलने से बदल रहा पानी का चक्र
रिपोर्ट के अनुसार, झेलम की सहायक नदी दूध गंगा पीर पंजाल के हिमनदों से निकलती है। शुरुआती हिस्से में हिमनदों, झरनों और बर्फ से पोषित झीलों से इसे पानी मिलता है। बडगाम और पुलवामा की घाटियों से गुजरकर नदी श्रीनगर पहुंचती है। इस तरह ऊपरी क्षेत्रों में जमा बर्फ नदी के पानी का अहम आधार है।
रिपोर्ट में पृथ्वी वैज्ञानिक शकील रोमशू ने बताया कि पहले सर्दियों की बर्फ कई महीने जमी रहती थी। अप्रैल से जुलाई के बीच उसके धीरे-धीरे पिघलने से गर्मियों में पानी मिलता था। अब कम बर्फबारी और सर्दियों में बढ़ते तापमान के कारण बर्फ फरवरी और मार्च में ही पिघलने लगती है। किसान के लिए यहां समझने वाली बात केवल पानी की मात्रा नहीं, उसके उपलब्ध होने का समय भी है।
रिपोर्ट में दिए गए 2024 के एक अध्ययन के अनुसार, पीर पंजाल के 122 हिमनदों का क्षेत्रफल 1980 में 25.7 वर्ग किलोमीटर था। यह 2020 में घटकर 15.9 वर्ग किलोमीटर रह गया। अध्ययन में उत्तर की ओर वाले हिमनदों के मुकाबले दक्षिण की ओर वाले हिमनदों के तेजी से पिघलने की बात सामने आई।
सूखे दौर और तेज बारिश, दोनों में आपूर्ति की मुश्किल
रिपोर्ट में जलापूर्ति विभाग की अधीक्षण अभियंता अंबरीना अंजुम ने बताया कि 2024 में कश्मीर में वर्षण की कमी करीब 80 प्रतिशत रही। उस दौरान दूध गंगा में बहाव काफी कम हो गया। शोधन के लिए पानी की भारी कमी हुई और जलापूर्ति में रुकावटें आईं।
अंजुम के हवाले से रिपोर्ट बताती है कि कम बहाव के दौरान नौहर से पर्याप्त पानी नहीं मिलने पर क्रालपोरा के पंपिंग स्टेशन पर निर्भरता बढ़ती है। आपूर्ति बनाए रखने के लिए उपलब्ध पानी को पंपिंग स्टेशन की ओर मोड़ने की अस्थायी व्यवस्था करनी पड़ती है।
दूसरी ओर, अंजुम ने बताया कि भारी बारिश और बादल फटने से नदी का पानी बहुत मटमैला हो सकता है। ऐसी स्थिति में फिल्टर प्रणाली को नुकसान या जाम होने से बचाने के लिए शोधन संयंत्र अस्थायी रूप से बंद करना पड़ता है। रिपोर्ट का यह पहलू बताता है कि ज्यादा बारिश होना और इस्तेमाल लायक पानी मिलना एक ही बात नहीं है।
प्राकृतिक रास्तों पर निर्माण ने भी बढ़ाया दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक, दूध गंगा के जलग्रहण क्षेत्र में अवैध निर्माण ने भी समस्या बढ़ाई है। श्रीनगर में बटमालू से गुजरने वाली नदी की धारा का रास्ता धीरे-धीरे पक्के निर्माणों, पार्कों और बस ठहराव स्थलों से ढक गया। सितंबर 2014 की बाढ़ में पानी इसी निचले रास्ते से बहा और बटमालू से कमरवारी तक का क्षेत्र डूब गया।
आगे की तैयारी के बारे में अंजुम ने रिपोर्ट में बताया कि विभाग अगले 30 से 40 वर्षों के लिए जलापूर्ति और संरक्षण के उपायों की योजना बना रहा है। इसमें जलग्रहण क्षेत्रों की स्थिति सुधारना और पानी का दोबारा इस्तेमाल बढ़ाना शामिल है। उन्होंने अनियमित बारिश, लंबे सूखे दौर और बादल फटने जैसी घटनाओं से बाढ़ और पानी की कमी, दोनों का जोखिम बढ़ने की आशंका जताई है।
किसान किन बातों पर ध्यान दें
- रिपोर्ट में बताए गए मौसमी बदलाव को समझें। बर्फ जल्दी पिघलने को गर्मियों तक पर्याप्त पानी मिलने की गारंटी न मानें।
- पानी की उपलब्धता पर विचार करते समय सूखे दौर के साथ तेज बारिश से आने वाले मटमैले पानी की समस्या भी ध्यान में रखें।
- जल संरक्षण की स्थानीय चर्चा में जलग्रहण क्षेत्र की हालत और प्राकृतिक बहाव के रास्तों को महत्व दें। रिपोर्ट में इन पर निर्माण का दबाव बताया गया है।
- अपने खेत की सिंचाई संबंधी फैसलों के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से सलाह लें।
स्रोत
- Doodh Ganga under pressure: How climate change is deepening water woes in uptown Srinagar, डाउन टू अर्थ (Down To Earth) की रिपोर्ट, 17 अक्टूबर 2026





