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मुनस्यारी में ट्राउट किसानों से मिले अभिलक्ष लिखी, क्लस्टर के विकास की समीक्षा

मत्स्यपालन सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने मुनस्यारी में ट्राउट पालकों के अनुभव सुने और शीतजल मत्स्यपालन के विकास की समीक्षा की। नेपाल को निर्यात और आईटीबीपी को आपूर्ति से किसानों के लिए बाजार के रास्ते खुले हैं।

एग्रीवाणी डेस्क · 3 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: मछली पकड़ने वाली नाव
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: Vinson Chu / Pexels

उत्तराखंड के मुनस्यारी में ट्राउट पालन के विकास, सहकारी समितियों की भूमिका और किसानों के बाजार जुड़ाव की समीक्षा हुई। पीआईबी की विज्ञप्ति के अनुसार, केंद्रीय मत्स्यपालन सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने 18 अक्टूबर 2026 को पिथौरागढ़ जिले के इस क्षेत्र का दौरा किया। उन्होंने किसानों से उनके अनुभव सुने और ठंडे पानी में मछली पालन के विकास कार्यों की प्रगति देखी।

किसानों के लिए इस खबर का महत्व उत्पादन के साथ बिक्री और तकनीकी सहयोग में भी है। उत्तराखंड से नेपाल को ट्राउट का निर्यात हो रहा है। राज्य का मत्स्यपालन विभाग एक समझौते के तहत आईटीबीपी को भी यह मछली उपलब्ध करा रहा है। इससे ट्राउट पालन का जुड़ाव निर्यात और संस्थागत बाजार, दोनों से बना है।

ठंडे पानी और सहकारिता से बढ़ा ट्राउट पालन

दौरे में सचिव ने जौहर मत्स्य स्वायत्त सहकारिता से जुड़े किसानों और नमजाला ट्राउट फार्म के पालकों से चर्चा की। किसानों ने ट्राउट पालन को लेकर अपनी बातें रखीं। लिखी ने रेनबो ट्राउट को टिकाऊ आजीविका के रूप में अपनाने में स्थानीय सहकारी समितियों के योगदान को सराहा।

गोरी गंगा की ठंडी धाराएं और पानी का अनुकूल तापमान मुनस्यारी में रेनबो ट्राउट पालन का आधार हैं। विज्ञप्ति में बताया गया है कि यहां पारंपरिक खेती के साथ मछली पालन ने अर्ध-व्यावसायिक रूप लिया है। यानी स्थानीय आजीविका में अब ट्राउट उत्पादन और बिक्री की भूमिका भी बढ़ी है।

देश में अधिसूचित मत्स्यपालन क्लस्टरों की संख्या 34 है। पीएमएमएसवाई के अंतर्गत पिथौरागढ़ को शीतजल मत्स्यपालन क्लस्टर का दर्जा मिला है। इस व्यवस्था में सहकारी समितियों को सशक्त बनाने और आजीविका के अवसर बढ़ाने की संभावना पर जोर दिया गया है।

नेपाल को निर्यात और आईटीबीपी से बाजार जुड़ाव

उत्तराखंड ने जून 2026 में पहली बार नेपाल को ट्राउट भेजकर अंतरराष्ट्रीय निर्यात की शुरुआत की थी। सचिव ने इस उपलब्धि को नए व्यापारिक रास्ते खुलने के रूप में रेखांकित किया। दूसरी ओर, राज्य सरकार और आईटीबीपी के समझौते से ट्राउट की संस्थागत आपूर्ति का संबंध बना है।

सीमावर्ती गांवों के लिए इसका महत्व मछली बेचने तक सीमित नहीं है। विज्ञप्ति के मुताबिक, ट्राउट पालन से आजीविका के विकल्प बढ़े हैं और प्रकृति आधारित पर्यटन को भी प्रोत्साहन मिला है। सचिव ने इसे किसानों की आय और सीमावर्ती गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाली गतिविधि बताया।

आगे बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर जोर

उत्तराखंड के लिए स्वीकृत परियोजनाओं की राशि 317 करोड़ रुपये है। इनमें आधुनिक मछली बाजार, मछली उतारने के केंद्र और सितारगंज का एकीकृत एक्वापार्क शामिल हैं। ये परियोजनाएं मत्स्य क्षेत्र के बुनियादी ढांचे के विस्तार का हिस्सा हैं।

राज्य की ट्राउट प्रोत्साहन योजना का परिव्यय 170 करोड़ रुपये है। इसमें 2028-29 तक रेसवे के विस्तार के साथ मिनी हैचरी की संख्या 100 और शीत भंडारण सुविधाओं की संख्या 600 करने का लक्ष्य रखा गया है। ये आगे के लक्ष्य हैं, इन्हें पूरा हो चुका निर्माण नहीं माना जाना चाहिए।

तकनीकी सहयोग के मामले में भीमताल स्थित डीसीएफआर की भूमिका भी सामने आई। यह संस्थान मुनस्यारी में रेनबो ट्राउट लाने के अलावा मछली बीज तैयार करने, रोग प्रबंधन और पालकों को प्रशिक्षण देने में वैज्ञानिक सहायता देता रहा है। किसानों के लिए इसका महत्व पालन के साथ जरूरी तकनीकी जानकारी का सहयोग मिलना है।

ट्राउट पालक इन बातों पर ध्यान दें

  • स्थानीय सहकारी समिति से क्लस्टर के विकास कार्यों और अपने क्षेत्र में उपलब्ध सहयोग की जानकारी लें।
  • बीज उत्पादन, बीमारी प्रबंधन और प्रशिक्षण संबंधी जरूरतों पर मत्स्यपालन विभाग से मार्गदर्शन लें।
  • नेपाल को निर्यात और आईटीबीपी को आपूर्ति से जुड़े बाजार अवसरों की जानकारी विभाग या अपनी सहकारी समिति से लें।
  • ट्राउट प्रोत्साहन योजना के लक्ष्य और अपने क्षेत्र में सुविधाओं की उपलब्धता को अलग-अलग समझें। निवेश की योजना बनाने से पहले स्थानीय कृषि विभाग से सलाह लें।

यह खबर किसी किसान साथी के काम आ सकती है

लेखक

एग्रीवाणी डेस्क

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