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मध्य प्रदेश में आदिवासी घरों पर बुलडोजर, फसलें नष्ट, वन अधिकारों पर सवाल

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों की झोपड़ियां गिराने के साथ खड़ी फसलें नष्ट की गईं। वन अधिकार का दावा लंबित होने के बीच हुई कार्रवाई ने जमीन और खेती की सुरक्षा पर सवाल उठाए हैं।

एग्रीवाणी डेस्क · 4 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: हरे-भरे खेत
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: JEFFERSON SPYPLANE / Pexels

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश के कोसमी गांव में 11 अक्टूबर 2026 की रात वन विकास निगम की टीम ने बरेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों की अस्थायी झोपड़ियां गिरा दीं। वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने पहुंची टीम के साथ चार खुदाई मशीनें और चार ट्रैक्टर थे। कार्रवाई में मक्का और अरहर की खड़ी फसलें भी नष्ट की गईं तथा सिंचाई के कुएं में मिट्टी और पत्थर भर दिए गए।

रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रभावित लोगों में शामिल इकराम बरेला का व्यक्तिगत वन अधिकार दावा फैसले की प्रतीक्षा में था। ऐसे में मामला केवल घर गिराने का नहीं, खेती वाली जमीन पर अधिकार की जांच पूरी होने से पहले कार्रवाई का भी है। ग्रामीणों ने परिवारों को बेदखल करने की धमकी दिए जाने का आरोप लगाया है।

खेती और सिंचाई, दोनों पर चोट

रिपोर्ट के मुताबिक, कोसमी गांव सिंहपुर ग्राम पंचायत के तहत आता है और नसरुल्लागंज, जिसे अब भैरुंदा कहा जाता है, में स्थित है। यहां जंगल और आबादी के बीच सीमा स्पष्ट करना कठिन है। राजस्व नक्शों में गांव की सीमाएं वन विभाग के प्रबंधन वाले वन खंडों से मिलती हैं। रिपोर्ट बताती है कि विभाग के अभिलेखों में दर्ज वन भूमि पर स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से रहते और खेती करते हो सकते हैं।

किसानों के लिए इस कार्रवाई का मतलब घर के साथ फसल और सिंचाई के साधन का नुकसान है। रिपोर्ट में मक्का और अरहर नष्ट होने तथा कुआं भरने का विवरण इसी असर को सामने रखता है। जमीन का विवाद इसलिए खेती से अलग नहीं है, क्योंकि उसी जमीन पर परिवारों की फसल खड़ी थी।

दावा लंबित था, मालिकाना हक तय नहीं हुआ था

डाउन टू अर्थ ने वन अधिकार पोर्टल के विवरण के आधार पर बताया है कि इकराम बरेला का दावा 11 दिसंबर 2025 को दर्ज हुआ था। जमीन सत्यापन की प्रविष्टि 18 जुलाई 2026 की है। इसके बाद 7 अगस्त को उपखंड समिति ने दावा जिला वन अधिकार समिति के पास भेजा। रिपोर्ट के अनुसार, 15 अक्टूबर तक अंतिम फैसला लंबित था।

इकराम ने रिपोर्ट में माना है कि उनके पास खेती वाली जमीन के स्वामित्व का दस्तावेज नहीं है, लेकिन वन अधिकार कानून के तहत दावा स्वीकार किए जाने की सरकारी रसीद है। दावे की रसीद और मालिकाना हक का फैसला अलग बातें हैं। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि आवेदन देने भर से स्वामित्व स्थापित नहीं होता।

साथ ही, रिपोर्ट के अनुसार वन अधिकार कानून की धारा 4(5) पात्र वनवासियों को अधिकारों की पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक बेदखली से संरक्षण देती है। इसी आधार पर रिपोर्ट सवाल उठाती है कि कार्रवाई से पहले लंबित दावों की स्थिति क्यों नहीं परखी गई।

प्रशासन की जांच और ग्रामीणों के दस्तावेज

रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कार्रवाई का विरोध किया और ग्रामीणों के समर्थन में धरना दिया। मुख्यमंत्री मोहन यादव के निर्देश पर जिला कलेक्टर ने जांच कर राज्य सरकार को रिपोर्ट भेजी। उस जांच में इकराम समेत नौ लोगों पर 31.48 हेक्टेयर वन भूमि घेरने और निगम के लगाए 78,700 सागौन पौधे नष्ट करने का आरोप है। उपग्रह चित्रों के आधार पर कब्जा 2022 में शुरू होने का दावा किया गया है।

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट इस दावे के बरक्स ग्रामीणों के पास मौजूद वन विभाग की पुरानी कार्रवाइयों से जुड़े कागजों का उल्लेख करती है। इनमें 2006 और उसके बाद के अभिलेख हैं। ग्रामीणों के अनुसार कुछ पुराने कागज नहीं मिल रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि व्यक्तिगत वन अधिकार दावे में 13 दिसंबर 2005 से पहले का कब्जा महत्वपूर्ण है। इसलिए पुराने अभिलेखों की जांच जमीन पर बसावट और खेती का इतिहास समझने के लिए जरूरी है।

आगे अधिकारों की जांच कैसे बढ़े

रिपोर्ट का तर्क है कि वन भूमि का प्रबंधन निगम को सौंपना प्रशासनिक फैसला है, जबकि पात्र निवासियों के अधिकार तय करना अलग कानूनी प्रक्रिया है। प्रबंधन बदलने से उनके अधिकार समाप्त नहीं होते। ग्रामीणों का कहना है कि निगम को सौंपा गया वन खंड 426 उनकी पारंपरिक ग्राम सीमा में है। रिपोर्ट इसे ग्राम सभा के सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की जांच से भी जोड़ती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित समुदायों की भोपाल तक प्रस्तावित पदयात्रा चौहान और यादव की बैठक के बाद स्थगित हो गई, लेकिन अधिकारों का प्रश्न अनसुलझा रहा। आगे के रास्ते के रूप में रिपोर्ट पुराने उपग्रह चित्र, वन कार्ययोजनाएं और 2005 से पहले के अतिक्रमण रजिस्टर सार्वजनिक करने का सुझाव देती है। यह रिपोर्ट की सिफारिश है, सरकारी घोषणा नहीं।

किसान किन बातों पर ध्यान दें

  • दावा दर्ज होने की रसीद और अधिकार पर अंतिम फैसले में अंतर समझें। रिपोर्ट के अनुसार, रसीद अपने आप मालिकाना हक नहीं बनती।
  • वन अधिकार पोर्टल पर दावे, सत्यापन और समिति के स्तर की स्थिति देखें। कोसमी मामले में यही विवरण कार्रवाई पर सवाल का आधार बना है।
  • पुरानी विभागीय कार्रवाई और जमीन पर कब्जे से जुड़े उपलब्ध कागज संभालकर रखें। रिपोर्ट इन्हें दावों की पड़ताल के लिए महत्वपूर्ण बताती है।
  • ग्राम सभा और पंचायत को पुराने सरकारी अभिलेखों की प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग उठाएं। रिपोर्ट ने इन्हीं दस्तावेजों से ग्रामीणों के दावों को पुष्ट करने का रास्ता सुझाया है।

स्रोत

यह खबर किसी किसान साथी के काम आ सकती है

लेखक

एग्रीवाणी डेस्क

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