सीधे खबरों पर जाएं
AgriVaani एग्रीवाणी: खेती का यथार्थ और हिसाबEN English
ताजा

पत्थर खनन से रोजगार की उम्मीद, खेत और पानी की सुरक्षा का सवाल

गायघाट और गिजवाही में खनन ब्लॉकों की बंदोबस्ती शुरू होने से स्थानीय रोजगार की उम्मीद जुड़ी है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट खेतों, जलस्रोतों और गांव के रास्तों पर पड़ने वाले असर का साझा आकलन जरूरी बताती है।

एग्रीवाणी डेस्क · 4 मिनट में पढ़ें
स्वचालित रिपोर्ट, संपादकीय निगरानी में
प्रतीकात्मक तस्वीर: हरे-भरे खेत
प्रतीकात्मक तस्वीर · फोटो: Vladimir Srajber / Pexels

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2026 में गायघाट और गिजवाही के दो पत्थर खनन ब्लॉकों की बंदोबस्ती शुरू हुई। इनका क्षेत्र करीब 13 हेक्टेयर और शुरुआती निविदा राशि लगभग 24 करोड़ रुपये बताई गई है। गांवों के लिए इससे स्थानीय काम की उम्मीद जुड़ी है, लेकिन खेत, पानी और रोजमर्रा के रास्तों की सुरक्षा भी बड़ा सवाल है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि बिहार सरकार ने साल 2007 में जिन पहाड़ी इलाकों में पत्थर निकालने पर रोक लगाई थी, वहां दोबारा नीलामी की प्रक्रिया बढ़ी है। बांसा के निवासी बिघन चौधरी ने स्थानीय रोजगार मिलने पर बाहर जाने की जरूरत घटने की उम्मीद जताई। किसानों के लिए मुद्दा यही है कि नई आमदनी के साथ खेती और पशुपालन के संसाधन कैसे सुरक्षित रहेंगे।

रोजगार का फायदा और गांव पर पड़ने वाला बोझ

रिपोर्ट के अनुसार, पत्थर ढुलाई, मशीनों से जुड़े काम, लदाई और क्रशिंग में रोजगार बन सकता है। निर्माण के लिए पत्थर और राज्य को राजस्व मिलने का आर्थिक पक्ष भी है। हालांकि स्थानीय निवासी रामप्रवेश की चिंता है कि काम कुछ लोगों को मिलेगा, जबकि गतिविधियों से होने वाले बदलाव पूरे समुदाय तक पहुंच सकते हैं।

रिपोर्ट शुरुआती असर वाले इलाके में 15,000 से 20,000 लोगों के आने का अनुमान लगाती है। इसका आधार गांवों की आबादी और खनन से जुड़ी ढुलाई के रास्ते हैं। यह अनुमान बताता है कि परियोजना को केवल खदान की जमीन तक सीमित रखकर नहीं देखा जा सकता। पर्यावरण पत्रकार उमेश कुमार राय ने रिपोर्ट में समझाया है कि पत्थर निकलने के बाद क्रशर, ट्रक, मलबा रखने की जगह और परिवहन मार्ग भी इसके असर से जुड़ेंगे।

किसानों के लिए पानी और रास्ते क्यों अहम हैं

रिपोर्ट में गायघाट और गिजवाही की पहाड़ियों के पास खेती, घरों और पशुओं के आने-जाने के रास्तों का उल्लेख है। बारिश का बहाव भी इन्हीं ढलानों से गुजरता है। रिपोर्ट के मुताबिक, चट्टान हटने से पानी का रास्ता बदल सकता है, लेकिन वास्तविक प्रभाव वहां की भूगर्भीय स्थिति पर निर्भर करेगा। इसलिए इसे तय नुकसान मानने के बजाय खनन से पहले जांचना जरूरी है।

रिपोर्ट की मांग है कि जलग्रहण क्षेत्र, नजदीकी जलस्रोत और बारिश में खेतों तक मलबा पहुंचने की आशंका का पहले आकलन हो। किसान के लिए इसका मतलब है कि बाद में पानी या जलनिकासी में बदलाव हो तो तुलना के लिए पहले की स्थिति दर्ज रहे। धनकरहा के बिश्वनाथ सिंह ने रिपोर्ट में बताया कि गांव की सड़क खेती तक पहुंचने, बच्चों के स्कूल जाने और पशुओं को चराने के काम आती है। चराई की पहुंच घटने का असर आजीविका पर पड़ सकता है।

खनन विशेषज्ञ शिवम कुमार ने रिपोर्ट में ड्रिलिंग, पत्थर तोड़ने और वाहनों से धूल बढ़ने की संभावना बताई है। विस्फोट से आवाज और कंपन का जोखिम भी जुड़ा है। रिपोर्ट निगरानी के नतीजे ग्रामीणों के सामने रखने और घरों व स्कूलों की सुरक्षा की जवाबदेही तय करने पर जोर देती है।

नीलामी के बाद भी मंजूरियों की शर्त

रिपोर्ट के मुताबिक, बोली सफल होने से तत्काल पत्थर निकालना शुरू नहीं किया जा सकता। काम शुरू करने के लिए खनन योजना की मंजूरी और पर्यावरण संबंधी स्वीकृति जरूरी हैं। प्रदूषण बोर्ड से स्थापना तथा संचालन की सहमति भी लेनी होती है। रिपोर्ट बताती है कि बिहार के 2026 के आदेश कुछ ब्लॉकों में योजना और पर्यावरण स्वीकृति नीलामी से पहले कराने की व्यवस्था रखते हैं।

रिपोर्ट में नीलामी के दस्तावेजों के हवाले से जीपीएस, ड्रोन सर्वे, ई-चालान और उत्पादन पर ऑनलाइन नजर रखने के प्रावधान बताए गए हैं। वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र मिश्र का कहना है कि उत्पादन के वास्तविक आंकड़ों को मंजूर सीमा, तौल और ढुलाई के रिकॉर्ड से मिलाना जरूरी है। केवल डिजिटल रिकॉर्ड होना प्रभावी नियंत्रण का भरोसा नहीं देता।

अगला सवाल पूरे इलाके की जांच का

रिपोर्ट के अनुसार, करवंदिया और जमुहार के मौजूदा खनन केंद्रों के बीच नए ब्लॉक जुड़ने पर सभी खदानों, क्रशरों और ट्रकों का मिला-जुला दबाव देखना होगा। अलग-अलग परियोजनाओं का आकलन पूरे इलाके की स्थिति नहीं दिखाएगा। पानी, परिवहन और क्षेत्र पर पड़ने वाले दबाव की संयुक्त जांच इसी कारण अहम है।

वनवासी सेवा केंद्र के अध्यक्ष डॉ. सदानंद राय ने रिपोर्ट में खनन के बाद की जमीन को लेकर चिंता जताई है। उनके अनुसार, बहाली को पौधरोपण या गड्ढे भरने तक नहीं समेटना चाहिए। बाद में जमीन, पानी की निकासी और प्राकृतिक आवास की हालत कैसी होगी, इसका भी हिसाब और निगरानी जरूरी है।

किसान किन बातों पर ध्यान दें

  • रिपोर्ट में उठे सवालों के आधार पर खदान की मंजूरियों, उत्पादन सीमा और शर्तों को सार्वजनिक करने की मांग रखें।
  • खेत, जलस्रोत और बरसाती बहाव की शुरुआती स्थिति आकलन में शामिल कराने पर जोर दें।
  • ढुलाई की योजना में खेती तक पहुंच, बच्चों का आवागमन और पशुओं के चराई रास्तों की सुरक्षा देखें।
  • धूल, पानी और कंपन की निगरानी के नतीजे तथा शिकायतों पर हुई कार्रवाई सार्वजनिक करने की मांग करें।

स्रोत

यह खबर किसी किसान साथी के काम आ सकती है

लेखक

एग्रीवाणी डेस्क

इससे जुड़ी खबरें